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Friday, October 21, 2016

कहां है वॉइस् रिकॉर्डर और कहां है मेरा कैमरा


वह इंसान रह रहकर याद आएगा

भास्‍कर उप्रेती

डेंगू के उपचार के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज हो ही रहा था कि अनुराग भाई का फ़ोन आया.."पापा नहीं रहे"..भवाली के लिए निकल रहा हूँ..अनुराग का नंबर सेव नहीं था सो समझ ही नहीं आया..लेकिन आवाज किसी परिचित की सी लगी..थोड़ी ही देर में विनीत का भीमताल से फ़ोन आ गया..'दयानंद अनंत नहीं रहे'..सर झन्ना गया..मन मानने को तैयार नहीं था.. दो महीने पहले उनसे मिला था कहलक्वीरा में..वे सड़क तक आने में समर्थ नहीं थे..लेकिन बाकी तो पूरे ठीक थे..हमने विश्व राजनीति पर पहले की तरह बातें कीं..उनके फ़िनलैंड से आये मित्र सईद साब के बारे में बातें हुईं..उनका आग्रह था कि वे लौटें इससे पहले उनका इंटरव्यू करो..मैंने हामी भरी थी..लेकिन इंटरव्यू के लिए जो दिन सोचा उसी दिन उनको फ्लाइट पकड़नी थी. अनंत जी दिमागी रूप से हमेशा की तरह अलर्ट थे. पिछले तीन साल से मैं उनसे कह रहा था..आप जल्दी अपनी जीवनी लिख दीजिये..पता नहीं किस दिन जाना हो जायेगा..लेकिन वे जीवनी लिखने से बचते रहे..उन्होंने कहा..'आई ऍम क्वाईट यंग..क्या कहती हो उमा?'. उमा जी ने कहा..आप तो 18 साल के हो रहे अभी..लेकिन अनंत जी वाकई चले गए..टी.बी. ने तो युवावस्था में ही जकड़ लिया था. तब सी.पी.आई. ने पी.पी.एच. की झोली पकड़ाकर उन्हें मुंबई से नैनीताल रवाना कर दिया था.
जिस नैनीताल में अनंत जन्मे..जिस नैनीताल के लिए वो महानगरों को पछाड़कर भागे-भागे आ गए..यहाँ तक कि दिल्ली में रची-बसी जीवन-संगिनी को भी इसी नैनीताल में झोंक दिया..उस नैनीताल से उनके जनाजे में एक मनिख नहीं आया...मुझे हमेशा से प्रिय रहे नैनीताल पर उस दिन भयानक गुस्सा आया..मैं बम बन सकता होता तो इस शहर पर फूटकर उसे फ़ोड़ ही डालता!
और दो दशक पहले तो दिल्ली में वो लगभग चले हीे गए थे..जब जानलेवा हमले के बाद कोमा में चले गए थे. उमा जी उन्हें वापस बुला लायी थीं. उनके हाथ में दुबारा कलम दी..विदेश से मित्र द्वारा भेजा कैमरा और वौइस् रिकॉर्डर तो हमेशा हाथ में ही रहता था..मानो अभी चल पड़ेंगे छापामार पत्रकारिता को. अभी कुछ समय पहले ही दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक से उनकी कहानियों का समग्र लाने का मामला भी बन गया था. अभी कुछ ही समय तक वे युगवाणी के लिए कॉलम लिख ही रहे थे..अनंत जी के भीतर अनंत आत्माएं थीं. नैनीताल में दरोगा के घर जन्मे ..फिर नास्तिक हुए..फिर मुंबई..लाहौर..कराँची..मोस्को..लंदन..कहीं किसी काम में मन रमा नहीं..दूरदर्शन में उनकी रचनाओं के मंचन कब के आ गए..लगातार खुद को तोड़ते चले गए..खुद को किसी बुत में ढलने नहीं दिया.. फैज, कैफ़ी, मजाज, सरदार जाफ़री..संगी साथी थे..कवि/गीतकार शैलेन्द्र को उन्होंने ही मार-मारकर कम्युनिस्ट बनाया..हिंदी के बड़े-बड़े लेखकों की शुरुआती रचनाएँ एडिट कीं..लेकिन वे लेखक बन गए तो कभी नहीं कहा..हासिल. दिल्ली में जो जोड़ा था, उसे दिल्ली ही छोड़कर आ गए अपनी भवाली की प्रिय झोपड़ी में रहने. गढ़वाल पितरों की भूमि थी, लेकिन वहां इसलिए नहीं गए कि बिरादर कहेंगे देखो न यहाँ पैदा हुआ..न रहा..अब बुढ़ापे में जमीन लेने आ गया. जबकि उनके अनुज विवेकानंद (आई.ए.एस.) और दूसरे अनुज कर्नल साब ने उनके हिस्से की 80 नाली जमीन उनके लिए जरूर रख छोड़ी थी. अनुराग से भी कहते..गढ़वाली होने के लिए जरूरी नहीं गढ़वाल में जमीन हो. तुम्हारे चाचा अपने आप देखेंगे..नहीं देखेंगे तो कभी दलित/ भूमिहीन भाईयों को दान कर आना. देहरादून आते तो मेरे किराये के घर में ही रहते..वहीं उनके जर्जर हो चुके यार उनसे मिलने आ जाते. कुछ नाम तो वे ऐसे बताते जो एक दशक पहले ही सिधार चुके होते..मैं उनसे कहता वो तो गए सर..तब वो कान की मशीन की संभालते हुए जोर से चीखते 'चला गया..'..फिर दुबारा धीमे स्वर में कहते.."अच्छा चला गया होगा". मृत्यु से वो कभी नहीं डरते..जबकि अपने प्रिय यार के किस्सों में खो जाते..किस्से आलोचना और आत्मालोचना से भरे होते..लेकिन कटुता कभी नहीं आने दी..खंडूड़ी परिवार (पूर्व सी.एम. खंडूड़ी का परिवार) के वे बड़े प्रशंसक थे, सिवा बी.सी. खंडूड़ी के. खंडूड़ी की पत्नी ही उनसे हमारे घर पर मिलने आ जाती, वे कभी उनके पास नहीं गए. मगर वे कहते घनानंद खंडूड़ी बड़ा आदमी था..उन्होंने मसूरी के बच्चों की शिक्षा का बीड़ा उठाया था. ये तो नेता हो गया..फिर कहते इस खंडूड़ी का अंग्रेजी-तलफ्फुज मैं ठीक करता था..और इसे पैग कैसे बनाते हैं मैंने ही सिखाया था. वो एक बार लंबे समय तक घर पर रहे तो डंगवाल आंटी ने एक दिन उन्हें घूरते हुए कहा..'अरे ये दया दाज्यू तो नहीं?' उन्होंने बचपन में उन्हें नैनीताल में देखा था. उनके पिता वहां डी.ऍफ़.ओ. रहे थे. फिर दोनों दया दाज्यू के बचपन की शरारतों के बारे में देर से बातें करते रहे..'ये तो मंदिर से पैसे चुरा लेते थे', 'ये तो आग माँगने जरूर आते थे', 'ये तो खूब स्मार्ट थे'..'फिर से भाग गये घर से..और अब देख रही हूँ इन्हें..'. 'हे भगवान ये तो अब भी इतने स्मार्ट हैं..और मैं तो कैसी चिमड़ी गयी हूँ.' ...तो अस्पताल से रिहा होने के दूसरे दिन नैनीताल श्मशान घाट यानी पाईन्स जाना हुआ. उनका जनाजा एकदम शांत था..कोई शोर नहीं..कोई चीख नहीं..कहलक्वीरा के ही चार-छह जन..मैं अजीब-सी उदासी से भर गया इस सुनसान मौत पर. अगर दिल्ली से उस दिन पंकज बिष्ट और डॉ. ज्योत्सना नहीं आतीं तो कोई बड़ा आदमी कहने को नहीं था वहां. सब के सब आम आदमी थे. नैनीताल से थोड़ी देरी के बाद महेश जोशी और अनिल कार्की पहुंचे..और जो दरअसल दोनों नैनीताल के नहीं थे. जिस नैनीताल में अनंत जन्मे..जिस नैनीताल के लिए वो महानगरों को पछाड़कर भागे-भागे आ गए..यहाँ तक कि दिल्ली में रची-बसी जीवन-संगिनी को भी इसी नैनीताल में झोंक दिया..उस नैनीताल से उनके जनाजे में एक मनिख नहीं आया...मुझे हमेशा से प्रिय रहे नैनीताल पर उस दिन भयानक गुस्सा आया..मैं बम बन सकता होता तो इस शहर पर फूटकर उसे फ़ोड़ ही डालता! खैर इसके बाद मैं कई दिन तक अनंत जी की फोटो अपने लैपटॉप में ढूंढता रहा..अमर उजाला के 'आखर' के लिए उनका पहला इंटरव्यू किया था डॉ विनोद पाण्डे (अहमदाबाद) और मैंने..उसके बाद दैनिक जागरण के लिए भी..उसके बाद तो बार-बार उनके घर जाना ही रहा..फोटो भी खिंचते रहे..लेकिन पता नहीं उनके जाते ही उनके फोटो कहाँ चले गए..हाँ उन्होंने हमारी जो फोटो खीचीं..वे सब की सब हैं..एक से एक बेहतरीन..वे हमेशा व्यक्तिपरता के खिलाफ रहे..और शायद उनके फोटो इसीलिए नहीं मिल रहे..उमा जी और सुनीता के साथ खींचा हमारी शादी से चार बरस पहले का ये फोटो हमें बहुत प्यारा है..एक बार तो उन्होंने हम दोनों की ढेरों फोटो खींचकर..उन्हें लैब से बनवाकर हमें बंच भेंट कर चौंका ही दिया था. कितने उत्साही ..कितने जिंदादिल थे दयानंद अनंत! (आज आठ दिन बाद उन पर कुछ लिखने की हिम्मत मैं कर पाया..और मन कर रहा है..लिखता चला जाऊं..बहुत शानदार यादें हैं इस शानदार दोस्त की संगत की.)"